ये बारिश नहीं ये तुम ही हो

जो मुझ तक ठंडक पहुँचा रही 

ये धूप नहीं ये तुम ही हो

जो मेरे गालों को सहला रही 

ये हवा नहीं ये तुम ही हो 

जो मेरे कानों  में कुछ कह रही 

 

बस कहने को तुम दूर हो 

तुम हो मेरे पास यहीं कहीं 

 

मेरे हर लफ़्ज़ में तुम 

अल्फ़ाज़ में तुम 

हर उस अनकही

बातों में तुम 

मेरे कहानी में तुम 

हर कविता में तुम 

 

बस कहने को तुम दूर हो 

तुम हो मेरे पास यहीं कहीं 

 

सुबह की रोशनी 

रात के सितारे 

याद दिलाती है तुम्हारी 

और कभी बात तुम्हारे 

खिल उठता है चेहरा मेरा 

ज़िंदा हूँ इन यादों के सहारे 

 

बस कहने को तुम दूर हो 

तुम हो मेरे पास यहीं कहीं 

 

 

 
 

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royrashi
royrashi@gmail.com

60 thoughts on “कहने को तुम दूर हो”

  1. मेरी कहानी में तुम, मेरी कविता में तुम, लफ्ज़ में तुम, अल्फ़ाज़ में तुम, यादो में भी और बातो में तुम……
    खूबसूरत दूरी की विरह रचना …

  2. “विरह” is an amazing theme and I’m looking forward to read all your poems. Reading Hindi for me has been limited to internet only these days. Keep writing!
    #ReadByPRB

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