I was in the US when I started getting homesick and missed my family a lot. I would sit alone and think of the happy days we spent together. Because of the difference in time zones, I couldn’t even make video calls whenever I felt like. This is one poem that I wrote during those days and when I shared it with baba, he absolutely loved it. A laminated print copy of this poem is still neatly placed in his room.

 

P.S. – If you are a non-Hindi reader, you can click the link below to my YouTube channel where you can watch me recite this poem.

 

“बाबा”

बाबा के लिए लिखने जाऊँ तो शब्द कम पर जाते है
बचपन लौट आता है मेरा, आँख भर आते है

छोटे छोटे हाथो ने कि है ना जाने कितनी शरारते
डाँट कभी भी पड़ी नहीं, बाबा सदा मुस्कुराते

शांत स्वभाव ठंडा दिमाग़ सहनशीलता के देवता
कितनी भी कठिन परिस्थिति हो चेहरे पे कभी नहीं दिखता

गणित हो या संगीत हो सब मे रुचि उन्होंने दिखाया
चाई बनाने का सही तारिक भी बाबा ने ही मुझको सिखाया

डगमगाती साइकल के पीछे भागते हुए उन्होंने मेरा डर भगाया
अपने निराले तरीक़े से हर पल मेरा आत्मविश्वास बढ़ाया

समय के पाबंद है वो समय की क़दर करते है
धूप या बारिश में भी हर काम समय पे करते है

शाम को पूजा करके शंख मैं बजाती थी
फिर देर तक हार्मोनीयम पे संगीत का रियाज़ करती थी

बाबा को मेरा गाना पसंद था वो मेरे साथ गुनगुनाते थे
कभी कभी ख़ुश होने पे वो गाना भी संग गा लेते थे

रिज़ल्ट अच्छा हो या बुरा बाबा मिठाई ज़रूर लाते थे
माँ के डाँट से बचाते थे और माँ को भी माना लेते थे

ना जाने क्यूँ मैं निकल पड़ी पूरा करने सपनो को
रो पड़ती हूँ अकेले में याद करके अपनो को

जीवन के हर निर्णय को ख़ुद लेने का हौसला दिया
पढ़ाई हो या शादी हो मेरे हर ज़िद को पूरा किया

विदाई के वक़्त सबसे पहले बाबा ही रो पड़े
उनको देख के मेरे आँखों से आँसू ख़ुद ही निकल पड़े

आज भी रोती हूँ मैं छुपके जब भी बाबा की याद आती है
क्यूँ मैं इतनी दूर हूँ उनसे सोच के ख़ामोशी छा जाती है

काश मैं कभी बड़ी ना होती ना जाती उनसे दूर
काश जीवन की कोई रीत ना होती ना होती मैं मजबूर

 

 

Coming up next-

G – Guilt and Grief

 

 

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royrashi
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10 thoughts on “F – First Poem Dedicated to Baba”

  1. This is a heartfelt post Rashi. The poem is so beautifully written, with so many shades of emotions. I think every daughter can relate to this poem and all of them will become very emotional reading the words. It’s like a canvas with the painting of our journey with fathers.

  2. Was it the same poem that fetched you the prestigious Spotlight with Blogchatter, Rashi?
    Poem indeed is so beautiful.

  3. I was looking deep into your eyes while you were reciting the poem. You have been able to mask your pain well but the eyes convey it. I think your Baba lives in you teaching you how to be calm in every situation just like he did. I am just emotional watching this.

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