तेरे बिन

    अनसुनी मेरी हर बात है कश्मकश भरी हालात है तेरे बिन ओ साथिया जागते फिर क्यूँ जज़्बात है?   हटती नहीं नज़र तुमसे कटता नहीं ये पल मुझसे तू नहीं है सामने प्रीत फिर भी क्यूँ है तुमसे?   नज़रें ढूंढ़ती है चेहरा तेरा छीन लिया जो तूने चैन मेरा तू ना आएगा इस पल इंतज़ार फिर क्यूँ है तेरा?   सूख गयी स्याही क़लम की ख़ामोश पन्ने भी उदास है तू कहीं भी तो नहीं है फिर क्यूँ तेरे होने का एहसास है?   आज मीठी सी धूप खिली है

ख़्वाब

ख़्वाब जो साथ देखे है हमने हर उस सपने को सजाना है छोटे छोटे अनगिनत है हर ख़्वाहिश को पंख लगाना है   भाग दौड़ की ज़िंदगी में दो पल साथ बिताना है ख़ूबसूरत से उस पल में ख़ामोश ही रह जाना है   पहचान बनाने की इस दौड़ में ख़ुद को भूल जाना है ठेहरा हुआ एक शाम हो सुकून आजमाना है   अनकही बातों के समंदर में पलकों से सब कह जाना है कुछ सवालों के इशारे पे बस हल्का सा मुस्कुराना है   दूरी कभी ना हो हम में इतना प्यार जताना है आशियाँ हो तेरे बाहों का